संस्कृत व्याकरण
संस्कृत में व्याकरण की परम्परा बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा को शुद्ध रूप में जानने के लिए व्याकरण शास्त्र का अध्ययन किया जाता है। अपनी इस विशेषता के कारण ही यह वेद का सर्वप्रमुख अंग माना जाता है ('वेदांग'
- यस्य षष्ठी चतुर्थी च विहस्य च विहाय च।
- यस्याहं च द्वितीया स्याद् द्वितीया स्यामहं कथम् ॥
- जिसके लिए "विहस्य" छठी विभक्ति का है और "विहाय" चौथी विभक्ति का है ; "अहम् और कथम्"(शब्द) द्वितीया विभक्ति हो सकता है। मैं ऐसे व्यक्ति की पत्नी (द्वितीया) कैसे हो सकती हूँ?
- (ध्यान दें कि किसी पद के अन्त में 'स्य' लगने मात्र से वह षष्टी विभक्ति का नहीं हो जाता, और न ही 'आय' लगने से चतुर्थी विभक्ति का । विहस्य और विहाय ये दोनों अव्यय हैं, इनके रूप नहीं चलते। इसी तरह 'अहम्' और 'कथम्' में अन्त में 'म्' होने से वे द्वितीया विभक्ति के नहीं हो गये। अहम् यद्यपि म्-में अन्त होता है फिर भी वह प्रथमपुरुष-एकवचन का रूप है। इस सामान्य बात को भी जो नहीं समझता है, उसकी पत्नी कैसे बन सकती हूँ? अल्प ज्ञानी लोग ऐसी गलती प्रायः कर देते हैं। यह भी ध्यान दें कि उन दिनों में लडकियां इतनी पढी-लिखी थीं वे मूर्ख से विवाह करना नहीं चाहती थीं और वे अपने विचार रखने के लिए स्वतन्त्र थीं।)
वर्ण
जिस सार्थक ध्वनि का खंड नहीं हो सके, उसे वर्ण या अक्षर कहते हैं। वर्ण के दो भेद होते हैं-स्वर और व्यञ्जन।
स्वर वर्ण जिस सार्थक ध्वनि के उच्चारण में अन्य किसी वर्ण की सहायता नहीं ली जाए, उसे स्वर वर्ण कहते हैं। स्वर के उच्चारण में अन्दर से आनेवाली ध्वनि में किसी तरह की रुकावट नहीं होती है। स्वर 13 हैं-अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ, लु, ए, ऐ, ओ, औ। स्वर के तीन भेद हैं-ह्रस्व, दीर्घ और प्लुता
ह्रस्व स्वर -ह्रस्व स्वर के उच्चारण में बहुत कम समय लगता है। ये पाँच है-अ, इ, उ, ऋ और लु। ह्रस्व को मूल ध्वनि या मूल स्वर भी कहते हैं।
दीर्घ स्वर-दीर्घ स्वर के उच्चारण में ह्रस्व से दुगुना समय लगता है, यानी ह्रस्व के उच्चारण से कुछ अधिक जोर लगाना पड़ता है। दीर्घ स्वर आठ हैं-आ, ई, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ और औ।
प्लुत स्वर-प्लुत स्वर के उच्चारण में दीर्घ स्वर से भी अधिक जोर लगाना पड़ता है। इसका प्रयोग सम्बोधन वगैरह में होता है। जैसे-हे कृष्ण! व्यञ्जन वर्ण जिसका उच्चारण स्वर की सहायता से हो, उसे व्यञ्जन वर्ण कहते हैं। ये संख्या में 33 हैं।
कवर्ग-क ख ग घ ङ
चवर्ग-च छ ज झ ञ
टवर्ग-ट ठ ड ढ ण
तवर्ग-त थ द ध न )
पवर्ग-प फ ब भ म
अन्तःस्थ-य र ल व ऊष्म-श ष स ह अनुस्वार और विसर्ग-वर्गों के अंतर्गत अनुस्वार () और विसर्ग ( : ) की गणना नहीं होने पर भी ये वर्गों की तरह कार्य करते हैं। अनुस्वार का उच्चारण नाक से तथा विसर्ग का उच्चारण आधा 'ह' के समान होता है।
स्पर्श-क से लेकर म तक के वर्ण स्पर्श कहलाते हैं। अन्त:स्थ-य, र, ल और व को अन्तःस्थ वर्ण कहते हैं। ऊष्म-श, ष, स और ह को ऊष्म वर्ण कहते हैं। घोष-वर्गों के तृतीय, चतुर्थ, पंचम वर्ण तथा य, र, ल, व और ह घोष होते हैं। अघोष-वर्गों के प्रथम और द्वितीय वर्ण तथा श, ष, स अघोष होते हैं। अल्पप्राण-वर्गों के प्रथम, तृतीय, पंचम तथा य, र, ल, व वर्ण अल्पप्राण होते हैं। महाप्राण-वर्गों के द्वितीय, चतुर्थ तथा श, ष, स, ह वर्ण महाप्राण होते हैं।
वर्णों का उच्चारण-स्थान
अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः-अ, आ, कवर्ग, ह और विसर्ग का उच्चारण-स्थान कंठ है। इसलिए ये कण्ठ्य वर्ण कहलाते हैं।
इचुयशानां तालुः-इ, ई, चवर्ग, य् और श् का उच्चारण-स्थान तालु है, इसलिए ये तालव्य वर्ण कहलाते हैं।
ऋटुरषाणां मूर्द्धा-ऋ, ऋ, टवर्ग, र् और ष् का उच्चारण-स्थान मूर्द्धा है, इसलिए ये मूर्धन्य वर्ण कहलाते हैं।
लुतुलसानां दन्ताः-लु, तवर्ग, ल और स् का उच्चारण दाँत से होता है, इसलिए ये दन्त्य वर्ण कहलाते हैं।
उपूपध्मानीयानामोष्ठौ-उ, ऊ और पवर्ग का उच्चारण-स्थान ओष्ठ है, इसलिए ये ओष्ठ्य वर्ण कहलाते हैं।
एदैतोः कण्ठतालुः-ए और ऐ का उच्चारण-स्थान कण्ठ और तालु है। इसलिए इन्हें कण्ठ्य-तालव्य कहते हैं।
ओदौतोः कण्ठोष्ठम्-ओ और औ का उच्चारण कण्ठ और ओष्ठ से होता है, इसलिए इन्हें कण्ठ्यौष्ठ्य वर्ण कहते हैं।
- लिंग
- पुल्लिंग- जिस शब्द में पुरुष जाति का बोध होता है, उसे पुलिंग कहते हैं।(जैसे रामः, बालकः, सः आदि)
- स: बालकः अस्ति।
- तौ बालकौ स्तः
- ते बालकाः सन्ति।
- स्त्रीलिंग- जिस शब्द से स्त्री जाति का बोध होता है, उसे स्त्रीलिंग कहते हैं। (जैसे रमा, बालिका, सा आदि)
- सा बालिका अस्ति।
- ते बालिके स्तः।
- ताः बालिकाःसन्ति।
- नपुंसकलिंग (जैसे: फलम् , गृहम, पुस्तकम , तत् आदि)
- पुरुष
- प्रथम पुरुष (third person) - स:, तौ, ते
- मध्यम पुरुष (Second person) - त्वम्, युवाम्, यूयम्
- उत्तम पुरुष (first person) - अहं, आवाम्, वयम्
कारक की परिभाषाः - क्रिया के करने में जो सहायक हो उसे करक कहते हैंसंस्कृत में कारक के सात भेद होते हैं- कर्ता कारक
- कर्म कारक
- करण कारक
- सम्प्रदान कारक
- अपादान कारक
- सम्बन्ध करक
- अधिकरण कारक
- कारक नाम - वाक्य के अन्दर उपस्थित पहचान-चिह्न
कर्ता - ने (राम: गच्छति।)
कर्म - को (to) (बालकः विद्यालयं गच्छति।)
करण - से (by), द्वारा (सः हस्तेन खादति।)
सम्प्रदान -को के लिये (for) (निर्धनाय धनं देयं।)
अपादान - से (from) अलगाव (वृक्षात् पत्राणि पतन्ति।)
सम्बन्ध - का, की, के (of), रा, री, रे, ना, नी, ने, ( रामः दशरथस्य पुत्रः आसीत्। )
अधिकरण - में, पे, पर (in/on) (यस्य गृहे माता नास्ति,)
सम्बोधन - हे,भो,अरे, (हे राजन् ! अहं निर्दोषः।)
- कर्ता कारक
२. उक्ते कर्तरि प्रथमा - कृति वाच्य में जहाँ कर्ता पद उक्त या कहा गया रहता है वहां तो कृति वाच्य में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है।जैसे - रामः गृहं गच्छति - राम घर जाता है। यहाँ पर राम में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग हुआ है।ऊपर मेंजितने भी वाक्य का प्रयोग हुआ है सब संज्ञा है। लेकिन आप चाहे तो सर्वनाम शब्द रूप , जैसे- मै , तुम , वह - अहम् , त्वम् , सः का प्रयोग कर सकते है;यहाँ पर इस बात का ध्यान रखे की कर्ता जिस वचन में है उसका क्रिया भी उसी वचन में होगाकर्ता यदि एक वचन में है तो उसका क्रिया भी एक वचन में होगा।अहम् गच्छामि , सः गच्छति , त्वम् गच्छसिऊपर के वाक्य में अहम् , सः , त्वम् एक वचन कर्ता है इसलिए इनके साथ एकवचन क्रिया - गच्छामि , गच्छति, गच्छसि का प्रयोग हुआ है।कर्ता यदि द्विवचन में हो तो क्रिया भी द्विवचन में होगा।आवाम गच्छावः , तौ गच्छतः , युवाम गच्छथःऊपर के वाक्य में आवाम , तौ ,युवाम द्विवचन कर्ता है इसलिए इनके साथ द्विवचन क्रिया गच्छावः,गच्छतः, गच्छथः का प्रयोग हुआ है।- कर्म कारक
सूत्र-कर्मणि द्वितीया ।
अर्थ-कर्तृवाच्य के कर्मकारक से द्वितीया विभक्ति होती है ।
जैसे(क) रामः संस्कृतम् पठति । (ख) अयं बालः पयसा ओदनं भुङ्क्ते ।
प्रथम नियम में कर्ता के ईप्सिततम को 'कर्मकारक' कहा गया है । इस दूसरे नियम से उस कर्मकारक को द्वितीया विभक्ति होती है, जैसा कि उपर्युक्त वाक्यों में 'संस्कृतम्' एवं 'ओदनम्' के प्रसंग में देखा जा सकता है।
सूत्र-अकथितञ्च ।
अर्थ--'दुह' आदि (बारह) एवं 'नी' आदि (चार) सोलह धातुओं के कर्म से जिस पदार्थ का सम्बन्ध होता है वह 'अकथित' (अविवक्षित) कहा जाता है और यह अविवक्षित (अकथित) पदार्थ ही इन धातुओं के कर्म से सम्बद्ध होने के कारण ‘गौण कर्म' कहा जाता है, जिसकी 'कर्म' संज्ञा होती है और द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे
(क) तण्डुलानोदनं पचति । (चावलों से भात पकाता है ।) (ख) व्रजमवरुणद्धि गाम् । (बाड़े में गायों को रोकता है।) (ग) माणवकं पन्थानं पृच्छति ।, (बालक से मार्ग पूछता है ।) (घ) वृक्षमविचिनोति फलानि । (वृक्ष से फलों को चुनता है ।)
उपर्युक्त उदाहरणों में 'पचति', 'अवरुणद्धि', 'पृच्छति' एवं 'अविचिनोति' क्रिया-पदों के कर्म हैं-'ओदनम्', 'गाम्', 'पन्थानम्' एवं 'फलानि' और इनसे सम्बद्ध होने के कारण क्रमशः 'तण्डुल', 'व्रज', 'मानवक' एवं 'वृक्ष' अकथित अर्थात् गौण कर्म हैं इसलिए इन सभी की 'कर्मसंज्ञा' हुई है और इनमें द्वितीया विभक्ति हुई है।
सूत्र-गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थशब्दकर्माकर्मकाणामपि कर्ता स णौ।
अर्थ--गत्यर्थक ('गम्' आदि), बुद्ध्यर्थक (ज्ञा, विद् आदि), प्रत्यवसानार्थक (भक्ष, भुज् आदि), शब्दकर्मक और अकर्मक धातुएँ (स्था, आस्, शीङ् आदि) हो सकते हैं । इन धातुओं का, अण्यन्तावस्था में (उस अवस्था में जब इन धातुओं से प्रेरणार्थक 'णिच्' प्रत्यय नहीं लगाया गया हो) जो कर्ता होता है, वह ण्यन्तावस्था में (प्रेरणार्थक बना लिये जाने पर) 'कर्मसंज्ञक' हो जाता है, उससे द्वितीया विभक्ति होती है । जैसे
(क) हरिः शत्रूनु स्वर्गमगमयत् । (हरि ने शत्रुओं को स्वर्ग भिजवाया ।) (ख) विष्णुः देवान् अमृतम् आशयत् । (विष्णु ने देवों को अमृत पिलाया ।)
ऊपर के उदाहरण में 'गम्' तथा 'अश्' धातुओं की ण्यन्तावस्था है । अण्यन्तावस्था में इनके कर्ता 'शत्रु' और 'देव' ण्यन्तावस्था में 'कर्मसंक' हो गये हैं, अतः इनको द्वितीया विभक्ति हुई है ।
सूत्र-तथायुक्तं चानीप्सितम् ।
अर्थ-कर्ता की ईप्सिततम वाली क्रिया के साथ रहनेवाला अनीप्सित भी कर्मकारक होता है और उससे द्वितीया विभक्ति होती है ।
जैसे(क) स ग्रामं गच्छन् तृणं स्पृशति ।
(वह ग्राम या गाँव को जाता हुआ घास को छूता है ।)
(ख) स कन्दुकं क्रीडन् क्षेत्रं पश्यति ।
(वह गेंद को खेलता हुआ खेत या मैदान को देखता है ।)
उपर्युक्त पहले वाक्य में 'ग्रामम्' कर्ता का ईप्सिततम है, अतः वह कर्मकारक है और उससे द्वितीया विभक्ति हुई है । इस ईप्सिततम कर्म के कर्ता की क्रिया 'गच्छन्' के साथ रहनेवाला अनीप्सित है 'तृणम्', अतः यह भी कर्मकारक हो गया है और इससे भी द्वितीया विभक्ति हुई है । इसी प्रकार, दूसरे वाक्य में 'कन्दुकम्' ईप्सिततम कर्म है और 'क्षेत्रम्' अनीप्सित कर्म।
सूत्र-क्रियाविशेषणे द्वितीया ।
अर्थ-किसी शब्द के क्रियाविशेषण होने पर उससे द्वितीया विभक्ति होती है।
जैसे--- (क) स मधुरं गायति । (वह मधुर गाता है ।)
(ख) मन्दधीः सुखं स्वपिति । (मूर्ख व्यक्ति सुखपूर्वक सोता है ।)
(ग) अयं जनः साधु भाषते । (यह आदमी ठीक बोलता है।)
उपर्युक्त वाक्यों में 'मधुरं', 'सुखं' और 'साधु' क्रियाविशेषण हैं और इनमें द्वितीया विभक्ति लगी हुई है।
विशेष ध्यातव्य
क्रियाविशेषण शब्द सदा द्वितीया विभक्ति के साथ एकवचन और नपुंसकलिंग में रहता
सूत्र-कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे। अथवा, अत्यन्तसंयोगे द्वितीया ।
अर्थ-अत्यन्त संयोग में, अर्थात् क्रिया के लगातार होते रहने पर 'काल' और 'मार्ग' के वाचक शब्दों में द्वितीया विभक्ति होती है। जैसेकालवाचक-स मासम् व्याकरणम् अधीते ।REEMENT
(वह महीने भर व्याकरण पढ़ता है) अध्व (माग)-वाचक-अस्ति क्रोशं कुटिला नदी ।
वार्तिक-अभितः परितः समयानिकषाहा प्रतियोगेऽपि ।
. निम्नलिखित शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति होती है
(क) उभयतः= दोनों ओर
-मार्गम् उभयतः वृक्षाः सन्ति । (मार्ग के दोनों ओर वृक्ष हैं ।)
(ख) सर्वतः चारों ओर न
-विद्यालयं सर्वतः मार्गाः सन्ति । (विद्यालय के चारों ओर मार्ग हैं।
(ग) अभितः चारों ओर
विद्यालयम् अभितः मार्गाः सन्ति ।
(विद्यालय के चारों ओर मार्ग हैं ।)
(घ) परितः = चारों ओर
विद्यालयं परितः मार्गाः सन्ति । (विद्यालय के चारों ओर मार्ग हैं ।)
(ङ) समया -समीप
ग्रामं समया नदी प्रवहति । (गाँव के समीप नदी बहती है ।)
(च) निकषा-समीप
ग्रामं निकषा क्रीडाक्षेत्रं वर्तते । (गाँव के समीप खेल का मैदान है ।)
(छ) प्रति-ओर
दीनं प्रति दयां कुरु । (गरीबों पर दया करो ।)
(ज) धिक्-धिक्कार —धिक् पापिनम् ।
(पापी को धिक्कार है ।)
(झ) उपर्युपरि-ऊपर-ऊपर
मेघम् उपर्युपरि वायुयानं गच्छति ।
(मेघ पर ऊपर-ऊपर वायुयान जा रहा है ।)
(ञ) अधोऽधः नीच-नीचे
मेघम् अधोऽधः पक्षिणः पतन्ति । (मेघ के नीचे-नीचे पक्षी उड़ते हैं ।)
(ट) अध्यधि-बीचोबीच
वनम् अध्यधि मार्गः याति । (वन के बीचोबीच राह जाती है ।)
(ठ) अन्तरा=मध्य
त्वां मां च अन्तरा प्रभुः वर्तते । (तुम्हारे और मेरे बीच में परमात्मा है ।)
(ड) अन्तरेण- बिना
अध्ययनम् अन्तरेण ज्ञानं न भवति ।
(अध्ययन के बिना ज्ञान नहीं होता है।)
(ढ) यावत्-जबतक
यावत् धर्मः तावत् सुखम् । (जब तक धर्म है तभी तक सुख है।)
ग्रामं यावत् मार्गों वर्तते । (गाँव तक रास्ता है ।)
2. विना (बिना) के योग में द्वितीया विभक्ति विकल्प से होती है। जैसे(क) धर्म विना सुखं न भवति । (धर्म के बिना सुख नहीं होता ।) (ख) परिश्रमं विना साफल्यं न मिलति ।
(परिश्रम के बिना सफलता नहीं मिलती ।)
करणकारक-तृतीया विभक्ति बस सूत्र-कर्तृकरणयोस्तृतीया ।
अर्थ-कर्मवाच्य या भाववाच्य के कर्ताकारक में और कर्तृवाच्य के करणकारक में तृतीया विभक्ति होती है । जैसे
(क) विप्रेण वेदः पठ्यते । (विप्र द्वारा वेद पढ़ा जाता है ।)।
-कर्मवाच्य का कर्ता (ख) छात्रेण पण्डितः भूयते । (छात्र द्वारा पण्डित बना जाता है ।)
-भाववाच्य का कर्ता (ग) रामः बाणेन रावणं हतवान् । (राम ने बाण से रावण को मारा ।)
-करणकारक सूत्र-अनुक्ते कर्तरि तृतीया ।
अर्थ-जो कर्ता कर्तृवाच्य का न हो, अनुक्त हो (कर्मवाच्य या भाववाच्य का हो), उससे तृतीया विभक्ति होती है । जैसे
(क) मोहनेन पत्रं लिख्यते । (मोहन से पत्र लिखा जाता है ।) (ख) विप्रेण पण्डितः भूयते । (ब्राह्मण से पण्डित हुआ जाता है ।) सूत्र-साधकतमं करणम् ।
अर्थ-किसी क्रिया की सिद्धि में सर्वाधिक सहायक कारक को 'करण' कारक कहते हैं । जैसे
(क) रामः बाणेन रावणं हतवान् । (राम ने बाण से रावण को मारा ।) (ख) कृष्णः मुष्टिकैः चाणूरं हतवान् । (कृष्ण ने मुक्कों से चाणूर को मारा ।) (ग) गोपालः लेखन्या पत्रं लिखति । (गोपाल कलम से पत्र लिखता है ।)
उपर्युक्त वाक्यों में कर्ता-क्रमशः 'रामः', 'कृष्णः' एवं 'गोपालः' के सर्वाधिक सहायक कारक 'बाणेन', 'मुष्टिकैः' एवं 'लेखन्या' हैं, अतः इनसे तृतीया विभक्ति हुई है । 'सूत्र-करणे तृतीया । अर्थ-करणकारक से तृतीया विभक्ति होती है । जैसे(क) रामः बाणेन रावणं हतवान् । (राम ने बाण से रावण को मारा ।)
(ख) कृष्णः मुष्टिकैः चाणूरं हतवान् । (कृष्ण ने मुक्कों से चाणूर को मार डाला ।) र सूत्र-प्रकृत्यादिभ्यः उपसंख्यानम् ।
अर्थ-'प्रकृति' आदि शब्दों से तृतीया विभक्ति होती है । जैसे(क) प्रकृतिः-प्रकृत्या चारुः अयं बालकः । (यह लड़का स्वभाव से सुन्दर है ।) (ख) गोत्रम्-गोत्रेण गार्ग्यः अयं ब्राह्मणः । (गोत्र से यह गार्ग्य ब्राह्मण है।) (ग) नाम-अहं वर्णेन वैश्यः ।
(मैं वर्ण से वैश्य हूँ।) (घ) सुखम्-मम सुखेन याति कालः । (मेरा समय सुख से बीतता है ।) सूत्र-अपवर्गे तृतीया ।
अर्थ-'अपवर्ग' में, अर्थात् किसी क्रिया की सिद्धि में कालवाचक और मार्गवाचक शब्दों से अत्यंत संयोग रहने पर तृतीया विभक्ति होती है । जैसे
(क) स मासेन व्याकरणम् अधीतवान् ।(उसने महीने भर में व्याकरण पढ़ लिया ।) (ख) अयं चतुर्भिः वर्षेः गृहं विनिर्मितवान् । (इसने चार वर्षों में घर बना लिया ।) (ग) योजनेन भवान् कथां समाप्तवान् । (आपने योजन भर में कथा समाप्त की ।) सूत्र-सहयुक्तेऽप्रधाने अथवा सहार्थे तृतीया ।
अर्थ-'सह' अथवा सह (साथ) के अर्थवाले शब्दों के योग में अप्रधान (गौण) में तृतीया विभक्ति होती है । जैसे
(क) पुत्रेण सह आगतः पिता । (बाप बेटे के साथ आया ।) (ख) छात्रेण समं गतः गुरुः । (गुरु छात्र के साथ गया ।) (ग) गुरुणा सार्धम् एकासने न आस्स्व । (गुरु के साथ एक ही आसन पर नहीं बैठो।) (घ) त्वं मया साकं तिष्ठ । (तुम मेरे साथ ठहरो ।) -सूत्र-येनाङ्गविकारः ।
अर्थ-जिस अंग के विकृत (दोषयुक्त) होने से अंगी (उस अंग या अवयव को धारण करनेवाले) में विकार (दोष) ज्ञात हो उस अंग के वाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है । जैसे
(क) अक्ष्णा काणः कामेश्वरः । (कामेश्वर आँख से काना है ।) (ख) कर्णेन बधिरः दिनेशः । (दिनेश कान से बहरा है ।)
(ग) पादेन खञ्जः गोपालः । (गोपाल पैर से लँगड़ा है।) । सूत्र–इत्थंभूतलक्षणे ।
अर्थ-जिस चिह्न या लक्षणविशेष के कारण कोई व्यक्ति विशेष प्रकार का लगता हो उससे तृतीया विभक्ति होती है । जैसे
(क) अयं जटाभिः तापसः ज्ञायते । (यह जटाओं से तपस्वी मालूम पड़ता है।) (ख) सः पुस्तकेन छात्रः प्रतीयते । (वह पुस्तक से छात्र मालूम पड़ता है ।) सूत्र-हेतौ अथवा हेतौ तृतीया ।
अर्थ-‘हेतु' में अर्थात् किसी कार्य के 'कारण' या प्रयोजन को सूचित करने में तृतीया विभक्ति होती है । जैसे
(क) दण्डेन घटः भवति । (दण्ड से घड़ा होता या बनता है ।) (ख) श्रमेण धनं भवति । (परिश्रम से धन प्राप्त होता है ।) (ग) पुण्येन सुखं मिलति । (पुण्य से सुख मिलता है ।)
उपर्युक्त वाक्यों में 'दण्ड', 'श्रम' और 'पुण्य' क्रमशः घट के निर्माण-कार्य, धन की प्राप्ति एवं सुख की उपलब्धि के 'कारण' अथवा प्रयोजनभूत हैं, अतः उनसे तृतीया विभक्ति हुई है।
सूत्र-ऊनवारणप्रयोजनार्थश्च ।
अर्थ-'ऊन' (कम), 'वारण' (रोकना) और 'प्रयोजन' (कार्य, अर्थ, गुण और उपयोगिता) अर्थवाले शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है । जैसेऊनार्थक- (क) एकेन ऊनम् (एक कम)
(ख) धनेन हीनम् (धन से रहित) (ग) गर्वेण शून्यः (गर्व से शून्य) (घ) क्रोधेन रहितः (क्रोध से रहित) (क) अलं विवादेन ! (विवाद व्यर्थ है। (ख) अलं श्रमेण ! (परिश्रम बेकार है।)
(ग) कलहेन किम् ? (झगड़े से क्या ?) प्रयोजनार्थक-(क) धनेन किं प्रयोजनम् ? (धन से क्या प्रयोजन ?)
(ख) श्रीमतः सेवकैर्न प्रयोजनम् । (श्रीमान् को नौकर नहीं चाहिए ।) (ग) तृणेन अपि कार्यं भवतीश्वराणाम् । (सम्पन्न लोगों का तिनके से भी
काम होता है।)
सूत्र-तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयान्यतरस्याम् । - अर्थ-'तुला' और 'उपमा' दो शब्दों को छोड़कर शेष तुल्य अर्थवाले शब्दों के साथ विकल्प से तृतीया विभक्ति होती है ।
जैसे—तुल्यः सदृशः समो वा कृष्णस्य कृष्णेन वा । •
(कृष्ण के समान, सदृश अथवा तुल्य)
सम्प्रदानकारक-चतुर्थी विभक्ति पर सत्र कर्मणा यमभिप्रेति स सम्प्रदानम |
अर्थ-दान-कर्म करते हुए जिसे कोई वस्तु दी जाती है उसे 'सम्प्रदानकारक' कहते हैं । 'सम्प्रदान' का धातुगत अर्थ भी यही है-"जिसको कोई वस्तु ठीक से दी जाती है, | वह ।" जैसे। (क) विप्राय गां ददाति यजमानः
(यजमान ब्राह्मण के लिए को गौ दान करता है ) (ख) सः भिक्षकाय अन्नं ददाति । म
(वह भिखारी को अन्न देता है ।) (ग) सर्वकारः छात्रेभ्यः वत्तिं ददाति ।
(सरकार छात्रों को छात्रवृत्ति देती है।)
सूत्र–क्रियया यमभिप्रैति सोऽपि सम्प्रदानम् ।
अर्थ-जब किसी क्रिया द्वारा कर्ता को कुछ अभिप्रेत होता है तब भी उस पदार्थ की सम्प्रदान संज्ञा होती है । जैसे—बालकाय यतते । (बालक के लिए यत्न करता है ।)
सूत्र-चतुर्थी सम्प्रदाने ।
अर्थ-जहाँ सम्प्रदान कारक होता है वहाँ चतुर्थी विभक्ति होती है । जैसे(क) विप्राय गां ददाति यजमानः । (ख) भिक्षुकाय अन्न ददाति स पुरुषः । (ग) छात्रेभ्यः वृत्तिं ददाति सर्वकारः ।
उपर्युक्त वाक्यों में 'विप्राय', 'भिक्षुकाय' एवं 'छात्रेभ्यः' पद सम्प्रदानकारक हैं, अतः उनसे चतुर्थी विभक्ति हुई है।
सूत्र-रुच्यर्थानां प्रियमाणः ।
अर्थ-'रुचने' (अच्छा लगने) के अर्थवाले धातुओं के योग में जिसको कोई वस्तु रुचती (पसन्द आती) है वह सम्प्रदानकारक होता है । जैसे
(क) हरये रोचते भक्तिः । (हरि को भक्ति रुचती है ।) (ख) मह्यं संस्कृतं रोचते । । (मुझे संस्कृत अच्छी लगती है ।) (ग) बालेभ्यः मिष्टान्नं रोचते । (बच्चों को मिठाई अच्छी लगती है ।)
सूत्र-धारेरुत्तमर्णः ।
अर्थ-'धारि' धातु के योग में उत्तमर्ण (साहुकार या देनेवाला) सम्प्रदानकारक होता है । जैसे
(क) रामः श्यामाय शतं धारयति । (राम श्याम के सौ रुपए कर्ज रखता है ।) (ख) त्वम् मह्यं शतं धारयसि । (तुम मेरे सौ रुपए धारते हो ।)
सम्बन्ध कारक और अधिकरण कारक
वाच्य
संस्कृत में तीन वाच्य होते हैं- कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य।
- कर्तृवाच्य में कर्तापद प्रथमा विभक्ति का होता है। छात्रः श्लोकं पठति- यहाँ छात्रः कर्ता है और प्रथमा विभक्ति में है।
- कर्मवाच्य में कर्तापद तृतीया विभक्ति का होता है। जैसे, छात्रेण श्लोकः पठ्यते। यहाँ छात्रेण तृतीया विभक्ति में है।
- अकर्मक धातु में कर्म नहीं होने के कारण क्रिया की प्रधानता होने से भाववाच्य के प्रयोग सिद्ध होते हैं। कर्ता की प्रधानता होने से कर्तृवाच्य प्रयोग सिद्ध होते हैं। भाववाच्य एवं कर्मवाच्य में क्रियारूप एक जैसे ही रहते हैं।
क्र कर्तृवाच्य भाववाच्य 1. भवान् तिष्ठतु भवता स्थीयताम् 2. भवती नृत्यतु भवत्या नृत्यताम् 3. त्वं वर्धस्व त्वया वर्ध्यताम् 4. भवन्तः न सिद्यन्ताम् भवद्भिः न खिद्यताम् 5. भवत्यः उत्तिष्ठन्तु भवतीभिः उत्थीयताम् 6. यूयं संचरत युष्माभिः संचर्यताम् 7. भवन्तौ रुदिताम् भवद्भयां रुद्यताम् 8. भवत्यौ हसताम् भवतीभ्यां हस्यताम् 9. विमानम् उड्डयताम् विमानेन उड्डीयताम् 10 सर्वे उपविशन्तु सर्वेः उपविश्यताम् - लकार
संस्कृत में लट् , लिट् , लुट् , लृट् , लेट् , लोट् , लङ् , लिङ् , लुङ् , लृङ् – ये दस लकार होते हैं। वास्तव में ये दस प्रत्यय हैं जो धातुओं में जोड़े जाते हैं। इन दसों प्रत्ययों के प्रारम्भ में 'ल' है इसलिए इन्हें 'लकार' कहते हैं (ठीक वैसे ही जैसे ॐकार, अकार, इकार, उकार इत्यादि)। इन दस लकारों में से आरम्भ के छः लकारों के अन्त में 'ट्' है- लट् लिट् लुट् आदि इसलिए ये टित् लकार कहे जाते हैं और अन्त के चार लकार ङित् कहे जाते हैं क्योंकि उनके अन्त में 'ङ्' है। व्याकरणशास्त्र में जब धातुओं से पिबति, खादति आदि रूप सिद्ध किये जाते हैं तब इन टित् और ङित् शब्दों का बहुत बार प्रयोग किया जाता है।
इन लकारों का प्रयोग विभिन्न कालों की क्रिया बताने के लिए किया जाता है। जैसे – जब वर्तमान काल की क्रिया बतानी हो तो धातु से लट् लकार जोड़ देंगे, परोक्ष भूतकाल की क्रिया बतानी हो तो लिट् लकार जोड़ेंगे।
(१) लट् लकार (= वर्तमान काल) जैसे :- श्यामः खेलति । ( श्याम खेलता है।)
(२) लिट् लकार (= अनद्यतन परोक्ष भूतकाल) जो अपने साथ न घटित होकर किसी इतिहास का विषय हो । जैसे :-- रामः रावणं ममार । ( राम ने रावण को मारा ।)
(३) लुट् लकार (= अनद्यतन भविष्यत् काल) जो आज का दिन छोड़ कर आगे होने वाला हो । जैसे :-- सः परश्वः विद्यालयं गन्ता । ( वह परसों विद्यालय जायेगा ।)
(४) लृट् लकार (= सामान्य भविष्य काल) जो आने वाले किसी भी समय में होने वाला हो । जैसे :--- रामः इदं कार्यं करिष्यति । (राम यह कार्य करेगा।)
(५) लेट् लकार (= यह लकार केवल वेद में प्रयोग होता है, ईश्वर के लिए, क्योंकि वह किसी काल में बंधा नहीं है।)
(६) लोट् लकार (= ये लकार आज्ञा, अनुमति लेना, प्रशंसा करना, प्रार्थना आदि में प्रयोग होता है ।) जैसे :- भवान् गच्छतु । (आप जाइए ) ; सः क्रीडतु । (वह खेले) ; त्वं खाद । (तुम खाओ ) ; किमहं वदानि । (क्या मैं बोलूँ ?)
(७) लङ् लकार (= अनद्यतन भूत काल ) आज का दिन छोड़ कर किसी अन्य दिन जो हुआ हो । जैसे :- भवान् तस्मिन् दिने भोजनमपचत् । (आपने उस दिन भोजन पकाया था।)
(८) लिङ् लकार = इसमें दो प्रकार के लकार होते हैं :--
- (क) आशीर्लिङ् (= किसी को आशीर्वाद देना हो) जैसे :- भवान् जीव्यात् (आप जीओ ) ; त्वं सुखी भूयात् । (तुम सुखी रहो।)
- (ख) विधिलिङ् (= किसी को विधि बतानी हो ।) जैसे :- भवान् पठेत् । (आपको पढ़ना चाहिए।) ; अहं गच्छेयम् । (मुझे जाना चाहिए।)
(९) लुङ् लकार (= सामान्य भूत काल) जो कभी भी बीत चुका हो । जैसे :- अहं भोजनम् अभक्षत् । (मैंने खाना खाया।)
(१०) लृङ् लकार (= ऐसा भूत काल जिसका प्रभाव वर्तमान तक हो) जब किसी क्रिया की असिद्धि हो गई हो । जैसे :- यदि त्वम् अपठिष्यत् तर्हि विद्वान् भवितुम् अर्हिष्यत् । (यदि तू पढ़ता तो विद्वान् बनता।)
इस बात को स्मरण रखने के लिए कि धातु से कब किस लकार को जोड़ेंगे, निम्नलिखित श्लोक स्मरण कर लीजिए-
- लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा ।
- विध्याशिषोर्लिङ् लोटौ च लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति ॥
- (अर्थात् लट् लकार वर्तमान काल में, लेट् लकार केवल वेद में, भूतकाल में लुङ् लङ् और लिट्, विधि और आशीर्वाद में लिङ् और लोट् लकार तथा भविष्यत् काल में लुट् लृट् और लृङ् लकारों
- धातु रूप
धातु के तीन भेद होते हैं
परस्मैपदी धातुआत्मनेपदी धातुउभयपदी धातु


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