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    हिन्दी कविता मैथिलीशरण गुप्त

     


    1. जीवन की ही जय है

    मृषा मृत्यु का भय है
    जीवन की ही जय है ।

    जीव की जड़ जमा रहा है
    नित नव वैभव कमा रहा है
    यह आत्मा अक्षय है
    जीवन की ही जय है।

    नया जन्म ही जग पाता है
    मरण मूढ़-सा रह जाता है
    एक बीज सौ उपजाता है
    सृष्टा बड़ा सदय है
    जीवन की ही जय है।

    जीवन पर सौ बार मरूँ मैं
    क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं
    यदि न उचित उपयोग करूँ मैं
    तो फिर महाप्रलय है
    जीवन की ही जय है।

    2. होली-होली-होली

    काली काली कोईल बोली-
    होली-होली-होली!

    हँस कर लाल लाल होठों पर हरयाली हिल डोली,
    फूटा यौवन, फाड़ प्रकृति की पीली पीली चोली।

    होली-होली-होली!
    अलस कमलिनी ने कलरव सुन उन्मद अँखियाँ खोली,
    मल दी ऊषा ने अम्बर में दिन के मुख पर रोली।

    होली-होली-होली!
    रागी फूलों ने पराग से भरली अपनी झोली,
    और ओस ने केसर उनके स्फुट-सम्पुट में घोली।

    होली-होली-होली!
    ऋतुने रवि-शशि के पलड़ों पर तुल्य प्रकृति निज तोली
    सिहर उठी सहसा क्यों मेरी भुवन-भावना भोली?

    होली-होली-होली!
    गूँज उठी खिलती कलियों पर उड़ अलियों की टोली,
    प्रिय की श्वास-सुरभि दक्षिण से आती है अनमोली।

    होली-होली-होली!

    (साकेत नवम सर्ग)

    3. किसान (कविता)

    हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है
    पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है

    हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ
    खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ
    आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में
    अधपेट खाकर फिर उन्हें है कांपना हेमंत में

    बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा
    है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा
    देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे
    किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे

    घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा
    घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा
    तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं
    किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं

    बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है
    है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है
    तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते
    यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते

    सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है
    है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है
    मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है
    शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है

    4. गुणगान-तेरे घर के द्वार बहुत हैं

    तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
    किसमें हो कर आऊं मैं?
    सब द्वारों पर भीड़ मची है,
    कैसे भीतर जाऊं मैं?

    द्बारपाल भय दिखलाते हैं,
    कुछ ही जन जाने पाते हैं,
    शेष सभी धक्के खाते हैं,
    क्यों कर घुसने पाऊं मैं?
    तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
    किसमें हो कर आऊं मैं?

    तेरी विभव कल्पना कर के,
    उसके वर्णन से मन भर के,
    भूल रहे हैं जन बाहर के
    कैसे तुझे भुलाऊं मैं?
    तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
    किसमें हो कर आऊं मैं?

    बीत चुकी है बेला सारी,
    किंतु न आयी मेरी बारी,
    करूँ कुटी की अब तैयारी,
    वहीं बैठ गुन गाऊं मैं।
    तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
    किसमें हो कर आऊं मैं?

    कुटी खोल भीतर जाता हूँ
    तो वैसा ही रह जाता हूँ
    तुझको यह कहते पाता हूँ-
    ‘अतिथि, कहो क्या लाउं मैं?’
    तेरे घर के द्वार बहुत हैं,
    किसमें हो कर आऊं मैं?

    5. दोनों ओर प्रेम पलता है

    दोनों ओर प्रेम पलता है।
    सखि, पतंग भी जलता है हा! दीपक भी जलता है!

    सीस हिलाकर दीपक कहता--
    ’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’
    पर पतंग पड़ कर ही रहता
    कितनी विह्वलता है!
    दोनों ओर प्रेम पलता है।

    बचकर हाय! पतंग मरे क्या?
    प्रणय छोड़ कर प्राण धरे क्या?
    जले नही तो मरा करे क्या?
    क्या यह असफलता है!
    दोनों ओर प्रेम पलता है।

    कहता है पतंग मन मारे--
    ’तुम महान, मैं लघु, पर प्यारे,
    क्या न मरण भी हाथ हमारे?
    शरण किसे छलता है?’
    दोनों ओर प्रेम पलता है।

    दीपक के जलने में आली,
    फिर भी है जीवन की लाली।
    किन्तु पतंग-भाग्य-लिपि काली,
    किसका वश चलता है?
    दोनों ओर प्रेम पलता है।

    जगती वणिग्वृत्ति है रखती,
    उसे चाहती जिससे चखती;
    काम नहीं, परिणाम निरखती।
    मुझको ही खलता है।
    दोनों ओर प्रेम पलता है।

    6. चारुचंद्र की चंचल किरणें

    चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
    स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
    पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
    मानों झूम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

    पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
    जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर-वीर निर्भीकमना,
    जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
    भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥

    किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
    राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
    बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
    जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!

    मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है,
    तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है।
    वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी,
    विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥

    कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
    आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।
    बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,
    मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई-

    क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
    है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?
    बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
    पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!

    है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,
    रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर।
    और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,
    शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है।

    सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,
    अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!
    अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
    पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥

    तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात,
    वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात।
    अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की।
    किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की!

    और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे,
    व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे।
    कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक;
    पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक!

    7. नहुष का पतन

    मत्त-सा नहुष चला बैठ ऋषियान में
    व्याकुल से देव चले साथ में, विमान में
    पिछड़े तो वाहक विशेषता से भार की
    अरोही अधीर हुआ प्रेरणा से मार की

    दिखता है मुझे तो कठिन मार्ग कटना
    अगर ये बढ़ना है तो कहूँ मैं किसे हटना?
    बस क्या यही है बस बैठ विधियाँ गढ़ो?
    अश्व से अड़ो ना अरे, कुछ तो बढ़ो, कुछ तो बढ़ो

    बार बार कन्धे फेरने को ऋषि अटके
    आतुर हो राजा ने सरौष पैर पटके
    क्षिप्त पद हाय! एक ऋषि को जा लगा
    सातों ऋषियों में महा क्षोभानल आ जगा

    भार बहें, बातें सुने, लातें भी सहें क्या हम
    तू ही कह क्रूर, मौन अब भी रहें क्या हम
    पैर था या सांप यह, डस गया संग ही
    पमर पतित हो तू होकर भुंजग ही

    राजा हतेज हुआ शाप सुनते ही काँप
    मानो डस गया हो उसे जैसे पिना साँप
    श्वास टूटने-सी मुख-मुद्रा हुई विकला
    "हा ! ये हुआ क्या?" यही व्यग्र वाक्य निकला

    जड़-सा सचिन्त वह नीचा सर करके
    पालकी का नाल डूबते का तृण धरके
    शून्य-पट-चित्र धुलता हुआ सा दृष्टि से
    देखा फिर उसने समक्ष शून्य दृष्टि से

    दीख पड़ा उसको न जाने क्या समीप सा
    चौंका एक साथ वह बुझता प्रदीप-सा -
    “संकट तो संकट, परन्तु यह भय क्या ?
    दूसरा सृजन नहीं मेरा एक लय क्या ?”

    सँभला अद्मय मानी वह खींचकर ढीले अंग -
    “कुछ नहीं स्वप्न था सो हो गया भला ही भंग
    कठिन कठोर सत्य तो भी शिरोधार्य है
    शांत हो महर्षि मुझे, सांप अंगीकार्य है"

    दुख में भी राजा मुसकराया पूर्व दर्प से
    मानते हो तुम अपने को डसा सर्प से
    होते ही परन्तु पद स्पर्श भूल चूक से
    मैं भी क्या डसा नहीं गया हूँ दण्डशूक से

    मानता हूँ भूल हुई, खेद मुझे इसका
    सौंपे वही कार्य, उसे धार्य हो जो जिसका
    स्वर्ग से पतन, किन्तु गोत्रीणी की गोद में
    और जिस जोन में जो, सो उसी में मोद में

    काल गतिशील मुझे लेके नहीं बेठैगा
    किन्तु उस जीवन में विष घुस पैठेगा
    फिर भी खोजने का कुछ रास्ता तो उठायेगें
    विष में भी अमृत छुपा वे कृति पायेगें

    मानता हूँ भूल गया नारद का कहना
    दैत्यों से बचाये भोग धाम रहना
    आप घुसा असुर हाय मेरे ही ह्रदय में
    मानता हूँ आप लज्जा पाप अविनय में

    मानता हूँ आड़ ही ली मैंने स्वाधिकार की
    मूल में तो प्रेरणा थी काम के विकार की
    माँगता हूँ आज मैं शची से भी खुली क्षमा
    विधि से बहिर्गता में भी साधवी वह ज्यों रमा

    मानता हूँ और सब हार नहीं मानता
    अपनी अगाति आज भी मैं जानता
    आज मेरा भुकत्योजित हो गया है स्वर्ग भी
    लेके दिखा दूँगा कल मैं ही अपवर्ग भी

    तन जिसका हो मन और आत्मा मेरा है
    चिन्ता नहीं बाहर उजाला या अँधेरा है
    चलना मुझे है बस अंत तक चलना
    गिरना ही मुख्य नहीं, मुख्य है सँभलना

    गिरना क्या उसका उठा ही नहीं जो कभी
    मैं ही तो उठा था आप गिरता हूँ जो अभी
    फिर भी ऊठूँगा और बढ़के रहूँगा मैं
    नर हूँ, पुरुष हूँ, चढ़ के रहूँगा मैं

    चाहे जहाँ मेरे उठने के लिये ठौर है
    किन्तु लिया भार आज मैंने कुछ और है
    उठना मुझे ही नहीं बस एक मात्र रीते हाथ
    मेरा देवता भी और ऊंचा उठे मेरे साथ

    8. सखि, वे मुझसे कहकर जाते

    सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
    कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?

    मुझको बहुत उन्होंने माना
    फिर भी क्या पूरा पहचाना?
    मैंने मुख्य उसी को जाना
    जो वे मन में लाते।
    सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

    स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
    प्रियतम को, प्राणों के पण में,
    हमीं भेज देती हैं रण में -
    क्षात्र-धर्म के नाते
    सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

    हु‌आ न यह भी भाग्य अभागा,
    किसपर विफल गर्व अब जागा?
    जिसने अपनाया था, त्यागा;
    रहे स्मरण ही आते!
    सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

    नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
    पर इनसे जो आँसू बहते,
    सदय हृदय वे कैसे सहते ?
    गये तरस ही खाते!
    सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

    जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
    दुखी न हों इस जन के दुख से,
    उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से ?
    आज अधिक वे भाते!
    सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

    गये, लौट भी वे आवेंगे,
    कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
    रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
    पर क्या गाते-गाते ?
    सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

    9. नर हो, न निराश करो मन को

    नर हो, न निराश करो मन को

    कुछ काम करो, कुछ काम करो
    जग में रह कर कुछ नाम करो
    यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
    समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
    कुछ तो उपयुक्त करो तन को
    नर हो, न निराश करो मन को।

    संभलो कि सुयोग न जाय चला
    कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
    समझो जग को न निरा सपना
    पथ आप प्रशस्त करो अपना
    अखिलेश्वर है अवलंबन को
    नर हो, न निराश करो मन को।

    जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
    फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
    तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
    उठके अमरत्व विधान करो
    दवरूप रहो भव कानन को
    नर हो न निराश करो मन को।

    निज गौरव का नित ज्ञान रहे
    हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
    मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
    सब जाय अभी पर मान रहे
    कुछ हो न तज़ो निज साधन को
    नर हो, न निराश करो मन को।

    प्रभु ने तुमको कर दान किए
    सब वांछित वस्तु विधान किए
    तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
    फिर है यह किसका दोष कहो
    समझो न अलभ्य किसी धन को
    नर हो, न निराश करो मन को।

    किस गौरव के तुम योग्य नहीं
    कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
    जान हो तुम भी जगदीश्वर के
    सब है जिसके अपने घर के
    फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
    नर हो, न निराश करो मन को।

    करके विधि वाद न खेद करो
    निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
    बनता बस उद्‌यम ही विधि है
    मिलती जिससे सुख की निधि है
    समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
    नर हो, न निराश करो मन को
    कुछ काम करो, कुछ काम करो।

    10. मुझे फूल मत मारो

    मुझे फूल मत मारो,
    मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो।
    होकर मधु के मीत मदन, पटु, तुम कटु गरल न गारो,
    मुझे विकलता, तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो।
    नही भोगनी यह मैं कोई, जो तुम जाल पसारो,
    बल हो तो सिन्दूर-बिन्दु यह--यह हरनेत्र निहारो!
    रूप-दर्प कंदर्प, तुम्हें तो मेरे पति पर वारो,
    लो, यह मेरी चरण-धूलि उस रति के सिर पर धारो!

    11. निरख सखी ये खंजन आए

    निरख सखी ये खंजन आए
    फेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मन भाए
    फैला उनके तन का आतप मन से सर सरसाए
    घूमे वे इस ओर वहाँ ये हंस यहाँ उड़ छाए
    करके ध्यान आज इस जन का निश्चय वे मुसकाए
    फूल उठे हैं कमल अधर से यह बन्धूक सुहाए
    स्वागत स्वागत शरद भाग्य से मैंने दर्शन पाए
    नभ ने मोती वारे लो ये अश्रु अर्घ्य भर लाए।

    12. मातृभूमि

    नीलांबर परिधान हरित तट पर सुन्दर है।
    सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥
    नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं।
    बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है॥
    करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की।
    हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥

    मृतक समान अशक्त, विवश आँखों को मीचे,
    गिरता दुआ विलोक गर्भ से हमको नीचे;
    करके जिसने कृपा हमें अवलम्ब दिया था,
    लेकर अपने अतुल अंक में त्राण किया था,
    जो जननी का भी सर्वदा थी पालन करती रही ।
    तू क्यों न हमारी पूज्य हो? मातृभूमि, माता मही!

    जिसकी रज में लोट-लोट कर बड़े हुये हैं।
    घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुये हैं॥
    परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये।
    जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाये॥
    हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में।
    हे मातृभूमि! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में?

    पालन, पोषण और जन्म का कारण तू ही,
    वक्ष-स्थल पर हमें कर रही धारन तू ही;
    अभ्रंकष प्रासाद और ये महल हमारे,
    बने हुए हैं अहो तुझी से तुझ पर सारे;
    हे मातृभूमि, हम जब कभी शरण न तेरी पायेंगे।
    बस, तभी प्रलय के पेट में सभी लीन हो जायेंगे ॥

    हमें जीवनाधार अन्न तू ही देती है,
    बदले में कुछ नहीं किसी से तू लेती है;
    श्रेष्ठ एक से एक विविध द्रव्यों के द्वारा,
    पोषण करती प्रेम भाव से सदा हमारा;
    हे मातृभूमि, उपजे न जो तुझ से कृषि-अंकुर कभी।
    तो तड़प तड़प कर जल मरें, जठरानल में हम सभी ।।

    पा कर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा।
    तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा?
    तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है।
    बस तेरे ही सुरस-सार से सनी हुई है॥
    फिर अन्त समय तू ही इसे अचल देख अपनायेगी।
    हे मातृभूमि! यह अन्त में तुझमें ही मिल जायेगी॥

    जिन मित्रों का मिलन मलिनता को है खोता,
    जिस प्रेमी का प्रेम हमें मुददायक होता;
    जिन स्वजनों को देख हृदय हर्षित हो जाता,
    नहीं टूटता कभी जन्म भर जिनसे नाता;
    उन सब में तेरा सर्वदा व्याप्त हो रहा तत्व है ।
    हे मातृभूमि, तेरे सदृश किसका महा महत्व है?

    निर्मल तेरा नीर अमृत के से उत्तम है।
    शीतल मंद सुगंध पवन हर लेता श्रम है॥
    षट्ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है।
    हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है॥
    शुचि-सुधा सींचता रात में, तुझ पर चन्द्रप्रकाश है।
    हे मातृभूमि! दिन में तरणि, करता तम का नाश है॥

    सुरभित, सुन्दर, सुखद, सुमन तुझ पर खिलते हैं।
    भाँति-भाँति के सरस, सुधोपम फल मिलते है॥
    औषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली।
    खानें शोभित कहीं धातु वर रत्नों वाली॥
    जो आवश्यक होते हमें, मिलते सभी पदार्थ हैं।
    हे मातृभूमि! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं॥

    दीख रही है कहीं दूर तक शैलश्रेणी,
    कहीं घनावलि बनी हुई है तेरी वेणी;
    नदियां पैर पखार रही हैं बनकर चेरी,
    पुष्पों से तरू-राजि कर रही पूजा तेरी;
    मृदु मलय-वायु मानो तुझे चन्दन चारु चढ़ा रही ।
    हे मातृभूमि, किसका न तू सात्विक भाव बढ़ा रही?

    क्षमामई, तू दयामई है, क्षेममई है।
    सुधामई, वात्सल्यमई, तू प्रेममई है॥
    विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुःखहर्त्री है।
    भय निवारिणी, शान्तिकारिणी, सुखकर्त्री है॥
    हे शरणदायिनी देवि, तू करती सब का त्राण है।
    हे मातृभूमि! सन्तान हम, तू जननी, तू प्राण है॥

    आते ही उपकार याद हे माता ! तेरा,
    हो जाता मन मुग्ध भक्ति-भावों का प्रेरा;
    तू पूजा के योग्य, कीर्ति तेरी हम गावें,
    मन होता है-तुझे उठा कर शीश-चढ़ावें;
    वह शक्ति कहां, हा ! क्या करें, क्यों हम को लज्जा न हो?
    हम मातृभूमि, केवल तुझे शीश झुका सकते अहो !

    कारण वश जब शोक-दाह से हम दहते हैं,
    तब तुझ पर ही लोट-लोट कर दुख सहते हैं ।
    पाखण्डी भी धूल चढ़ाकर तन में तेरी,
    कहलाते हैं साधु, नहीं लगती है देरी;
    इस तेरी ही शुचि धूलि में मातृभूमि वह शक्ति है-
    जो क्रूरों के भी चित्त में उपजा सकती भक्ति है!

    कोई व्यक्ति विशेष नहीं तेरा अपना है,
    जो यह समझे हाय ! देखता वह सपना है;
    तुझ को सारे जीव एक से ही प्यारे हैं,
    कर्मों के फल मात्र यहाँ न्यारे न्यारे हैं;
    हे मातृभूमि!, तेरे निकट सब का सब सम्बन्ध है।
    जो भेद मानता वह अहो! लोचनयुत भी अन्ध है ।।

    जिस पृथ्वी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे।
    उससे हे भगवान! कभी हम रहें न न्यारे॥
    लोट-लोट कर वहीं हृदय को शान्त करेंगे।
    उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे॥
    उस मातृभूमि की धूल में, जब पूरे सन जायेंगे।
    होकर भव-बन्धन- मुक्त हम, आत्म रूप बन जायेंगे॥

    13. भारत माता का मंदिर यह

    भारत माता का मंदिर यह
    समता का संवाद जहाँ,
    सबका शिव कल्याण यहाँ है
    पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

    जाति-धर्म या संप्रदाय का,
    नहीं भेद-व्यवधान यहाँ,
    सबका स्वागत, सबका आदर
    सबका सम सम्मान यहाँ ।
    राम, रहीम, बुद्ध, ईसा का,
    सुलभ एक सा ध्यान यहाँ,
    भिन्न-भिन्न भव संस्कृतियों के
    गुण गौरव का ज्ञान यहाँ ।

    नहीं चाहिए बुद्धि बैर की
    भला प्रेम का उन्माद यहाँ
    सबका शिव कल्याण यहाँ है,
    पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

    सब तीर्थों का एक तीर्थ यह
    ह्रदय पवित्र बना लें हम
    आओ यहाँ अजातशत्रु बन,
    सबको मित्र बना लें हम ।
    रेखाएँ प्रस्तुत हैं, अपने
    मन के चित्र बना लें हम ।
    सौ-सौ आदर्शों को लेकर
    एक चरित्र बना लें हम ।

    बैठो माता के आँगन में
    नाता भाई-बहन का
    समझे उसकी प्रसव वेदना
    वही लाल है माई का
    एक साथ मिल बाँट लो
    अपना हर्ष विषाद यहाँ
    सबका शिव कल्याण यहाँ है
    पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

    मिला सेव्य का हमें पुज़ारी
    सकल काम उस न्यायी का
    मुक्ति लाभ कर्तव्य यहाँ है
    एक एक अनुयायी का
    कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
    उठे एक जयनाद यहाँ
    सबका शिव कल्याण यहाँ है
    पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

    14. आर्य-हम कौन थे

    हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी
    आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी

    भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां
    फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां
    संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
    उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है

    यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है, इसके निवासी आर्य हैं
    विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं
    संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े
    पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े

    वे आर्य ही थे जो कभी, अपने लिये जीते न थे
    वे स्वार्थ रत हो मोह की, मदिरा कभी पीते न थे
    वे मंदिनी तल में, सुकृति के बीज बोते थे सदा
    परदुःख देख दयालुता से, द्रवित होते थे सदा

    संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी
    निश्चेष्ट हो कर किस तरह से, बैठ सकते थे कभी
    फैला यहीं से ज्ञान का, आलोक सब संसार में
    जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार में

    वे मोह बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे स्वाधीन थे
    सम्पूर्ण सुख संयुक्त थे, वे शांति शिखरासीन थे
    मन से, वचन से, कर्म से, वे प्रभु भजन में लीन थे
    विख्यात ब्रह्मानंद नद के, वे मनोहर मीन थे

    15. अर्जुन की प्रतिज्ञा

    उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उसका लगा,
    मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा ।
    मुख-बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ,
    प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित हुआ ?

    युग-नेत्र उनके जो अभी थे पूर्ण जल की धार-से,
    अब रोश के मारे हुए, वे दहकते अंगार-से ।
    निश्चय अरुणिमा-मिस अनल की जल उठी वह ज्वाल ही,
    तब तो दृगों का जल गया शोकाश्रु जल तत्काल ही ।

    साक्षी रहे संसार करता हूँ प्रतिज्ञा पार्थ मैं,
    पूरा करूँगा कार्य सब कथानुसार यथार्थ मैं ।
    जो एक बालक को कपट से मार हँसते हैँ अभी,
    वे शत्रु सत्वर शोक-सागर-मग्न दीखेंगे सभी ।

    अभिमन्यु-धन के निधन से कारण हुआ जो मूल है,
    इससे हमारे हत हृदय को, हो रहा जो शूल है,
    उस खल जयद्रथ को जगत में मृत्यु ही अब सार है,
    उन्मुक्त बस उसके लिये रौख नरक का द्वार है ।

    उपयुक्त उस खल को न यद्यपि मृत्यु का भी दंड है,
    पर मृत्यु से बढ़कर न जग में दण्ड और प्रचंड है ।
    अतएव कल उस नीच को रण-मघ्य जो मारूँ न मैं,
    तो सत्य कहता हूँ कभी शस्त्रास्त्र फिर धारूँ न मैं ।

    अथवा अधिक कहना वृथा है, पार्थ का प्रण है यही,
    साक्षी रहे सुन ये बचन रवि, शशि, अनल, अंबर, मही ।
    सूर्यास्त से पहले न जो मैं कल जयद्रथ-वधकरूँ,
    तो शपथ करता हूँ स्वयं मैं ही अनल में जल मरूँ ।

    16. मनुष्यता

    विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,
    मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी।
    हुई न यों सु–मृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिये,
    नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।
    यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

    उसी उदार की कथा सरस्वती बखानवी,
    उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
    उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती;
    तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
    अखण्ड आत्मभाव जो असीम विश्व में भरे,
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिये मरे।।

    सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है वही;
    वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
    विरूद्धवाद बुद्ध का दया–प्रवाह में बहा,
    विनीत लोक वर्ग क्या न सामने झुका रहे?
    अहा! वही उदार है परोपकार जो करे,
    वहीं मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

    अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े,
    समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े–बड़े।
    परस्परावलम्ब से उठो तथा बढ़ो सभी,
    अभी अमत्र्य–अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।
    रहो न यों कि एक से न काम और का सरे,
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

    "मनुष्य मात्र बन्धु है" यही बड़ा विवेक है,
    पुराणपुरूष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
    फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद है,
    परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
    अनर्थ है कि बंधु हो न बंधु की व्यथा हरे,
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

    चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
    विपत्ति विप्र जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
    घटे न हेल मेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
    अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
    तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे,
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

    रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में
    सन्त जन आपको करो न गर्व चित्त में
    अन्त को हैं यहाँ त्रिलोकनाथ साथ में
    दयालु दीन बन्धु के बडे विशाल हाथ हैं
    अतीव भाग्यहीन हैं अंधेर भाव जो भरे
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

    17. प्रतिशोध

    किसी जन ने किसी से क्लेश पाया
    नबी के पास वह अभियोग लाया।
    मुझे आज्ञा मिले प्रतिशोध लूँ मैं।
    नही निःशक्त वा निर्बोध हूँ मैं।
    उन्होंने शांत कर उसको कहा यों
    स्वजन मेरे न आतुर हो अहा यों।
    चले भी तो कहाँ तुम वैर लेने
    स्वयं भी घात पाकर घात देने
    क्षमा कर दो उसे मैं तो कहूँगा
    तुम्हारे शील का साक्षी रहूंगा
    दिखावो बंधु क्रम-विक्रम नया तुम
    यहाँ देकर वहाँ पाओ दया तुम।

    18. शिशिर न फिर गिरि वन में

    शिशिर न फिर गिरि वन में
    जितना माँगे पतझड़ दूँगी मैं इस निज नंदन में
    कितना कंपन तुझे चाहिए ले मेरे इस तन में
    सखी कह रही पांडुरता का क्या अभाव आनन में
    वीर जमा दे नयन नीर यदि तू मानस भाजन में
    तो मोती-सा मैं अकिंचना रक्खूँ उसको मन में
    हँसी गई रो भी न सकूँ मैं अपने इस जीवन में
    तो उत्कंठा है देखूँ फिर क्या हो भाव भुवन में।

    19. एकांत में यशोधरा

    आओ हो वनवासी!
    अब गृह भार नहीं सह सकती
    देव तुम्हारी दासी!!

    राहुल पल कर जैसे तैसे,
    करने लगा प्रश्न कुछ ऐसे,
    मैं अबोध उत्तर दूँ कैसे?
    वह मेरा विश्वासी,
    आओ हो वनवासी!

    उसे बताऊँ क्या तुम आओ,
    मुक्ति-युक्ति मुझसे सुन जाओ--
    जन्म-मूल मातृत्व मिटाओ,
    मिटे मरण-चौरासी!
    आओ हो वनवासी!

    सहे आज यह मान तितिक्षा,
    क्षमा करो मेरी यह शिक्षा;
    हमीं गृहस्थ जनों की भिक्षा,
    पालेगी सन्यासी!
    आओ हो वनवासी!

    मुझको सोती छोड़ गए हो,
    पीठ फेर मुँह मोड़ गए हो,
    तुम्हीं जोड़कर तोड़ गए हो,
    साधु विराग-विलासी!
    आओ हो वनवासी!

    जल में शतदल तुल्य सरसते
    तुम घर रहते, हम न तरसते,
    देखो, दो-दो मेघ बरसते
    मैं प्यासी की प्यासी!
    आओ हो वनवासी!

    20. माँ कह एक कहानी

    "माँ कह एक कहानी।"

    बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?"
    "कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी
    कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी?
    माँ कह एक कहानी।"

    "तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे,
    तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभि मनमानी।"
    "जहाँ सुरभि मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।"

    वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिंदु झिले थे,
    हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी।"
    "लहराता था पानी, हाँ-हाँ यही कहानी।"

    "गाते थे खग कल-कल स्वर से, सहसा एक हंस ऊपर से,
    गिरा बिद्ध होकर खग शर से, हुई पक्षी की हानी।"
    "हुई पक्षी की हानी? करुणा भरी कहानी!"

    चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया,
    इतने में आखेटक आया, लक्ष सिद्धि का मानी।"
    "लक्ष सिद्धि का मानी! कोमल कठिन कहानी।"

    "मांगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी,
    तब उसने जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी।"
    "हठ करने की ठानी! अब बढ़ चली कहानी।"

    हुआ विवाद सदय निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में,
    गयी बात तब न्यायालय में, सुनी सभी ने जानी।"
    "सुनी सभी ने जानी! व्यापक हुई कहानी।"

    राहुल तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका?
    कह दे निर्भय जय हो जिसका, सुन लँ तेरी बानी"
    "माँ मेरी क्या बानी? मैं सुन रहा कहानी।

    कोई निरपराध को मारे तो क्यों अन्य उसे न उबारे?
    रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी।"
    "न्याय दया का दानी! तूने गुनी कहानी।"

    21. सरकस

    होकर कौतूहल के बस में,
    गया एक दिन मैं सरकस में।
    भय-विस्मय के खेल अनोखे,
    देखे बहु व्यायाम अनोखे।
    एक बड़ा-सा बंदर आया,
    उसने झटपट लैम्प जलाया।
    डट कुर्सी पर पुस्तक खोली,
    आ तब तक मैना यौं बोली।
    ‘‘हाजिर है हजूर का घोड़ा,’’
    चौंक उठाया उसने कोड़ा।
    आया तब तक एक बछेरा,
    चढ़ बंदर ने उसको फेरा।
    टट्टू ने भी किया सपाटा,
    टट्टी फाँदी, चक्कर काटा।
    फिर बंदर कुर्सी पर बैठा,
    मुँह में चुरट दबाकर ऐंठा।
    माचिस लेकर उसे जलाया,
    और धुआँ भी खूब उड़ाया।
    ले उसकी अधजली सलाई,
    तोते ने आ तोप चलाई।
    एक मनुष्य अंत में आया,
    पकड़े हुए सिंह को लाया।
    मनुज-सिंह की देख लड़ाई,
    की मैंने इस भाँति बड़ाई-
    किसे साहसी जन डरता है,
    नर नाहर को वश करता है।
    मेरा एक मित्र तब बोला,
    भाई तू भी है बम भोला।
    यह सिंही का जना हुआ है,
    किंतु स्यार यह बना हुआ है।
    यह पिंजड़े में बंद रहा है,
    नहीं कभी स्वच्छंद रहा है।
    छोटे से यह पकड़ा आया,
    मार-मार कर गया सिखाया।
    अपनेको भी भूल गया है,
    आती इस पर मुझे दया है।

    22. ओला

    एक सफेद बड़ा-सा ओला,
    था मानो हीरे का गोला!
    हरी घास पर पड़ा हुआ था,
    वहीं पास मैं खड़ा हुआ था!
    मैंने पूछा क्या है भाई,
    तब उसने यों कथा सुनाई!
    जो मैं अपना हाल बताऊँ,
    कहने में भी लज्जा पाऊँ!
    पर मैं तुझै सुनाऊँगा सब,
    कुछ भी नहीं छिपाऊँगा अब!
    जो मेरा इतिहास सुनेंगे,
    वे उससे कुछ सार चुनेंगे!
    यद्यपि मैं न अब रहा कहीं का,
    वासी हूँ मैं किंतु यहीं का!
    सूरत मेरी बदल गई है,
    दीख रही वह तुम्हें नई है!
    मुझमें आर्द्रभाव था इतना,
    जल में हो सकता है जितना।
    मैं मोती-जैसा निर्मल था,
    तरल किंतु अत्यंत सरल था!

    23. दीपदान

    जल, रे दीपक, जल तू
    जिनके आगे अँधियारा है,
    उनके लिए उजल तू

    जोता, बोया, लुना जिन्होंने
    श्रम कर ओटा, धुना जिन्होंने
    बत्ती बँटकर तुझे संजोया,
    उनके तप का फल तू
    जल, रे दीपक, जल तू

    अपना तिल-तिल पिरवाया है
    तुझे स्नेह देकर पाया है
    उच्च स्थान दिया है घर में
    रह अविचल झलमल तू
    जल, रे दीपक, जल तू

    चूल्हा छोड़ जलाया तुझको
    क्या न दिया, जो पाया, तुझका
    भूल न जाना कभी ओट का
    वह पुनीत अँचल तू
    जल, रे दीपक, जल तू

    कुछ न रहेगा, बात रहेगी
    होगा प्रात, न रात रहेगी
    सब जागें तब सोना सुख से
    तात, न हो चंचल तू
    जल, रे दीपक, जल तू!

    24. कुशलगीत

    हाँ, निशान्त आया,
    तूने जब टेर प्रिये, कान्त, कान्त, उठो, गाया--
    चौँक शकुन-कुम्भ लिये हाँ, निशान्त गाया ।

    आहा! यह अभिव्यक्ति,
    द्रवित सार-धार-शक्ति ।
    तृण तृण की मसृण भक्ति
    भाव खींच लाया ।
    तूने जब टेर प्रिये, "कान्त, उठो" गाया !

    मगध वा सूत गये,
    किन्तु स्वर्ग-दूत नये,
    तेरे स्वर पूत अये,
    मैंने भर पाया ।
    तूने जब टेर प्रिये, "कान्त, उठो" गाया ।

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